बुआ के प्रति भतीजे की वासना-2

इस कहानी के पहले भाग
बुआ के प्रति भतीजे की वासना-1
अब तक आपने पढ़ा कि जग मुझसे किसी बात पर नाराज हो गया था. उसकी यह नाराजगी की वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी.
अब आगे..

दोपहर में जब मेरे पति चले गए तो मैं जग के पास उसके कमरे में गई और उसको खाने के लिए पूछा, तो उसने कहा- मुझे नहीं खाना, मैं पढ़ाई कर रहा हूँ.
वो फिर पढ़ने लगा.

मैंने कहा- क्या हुआ.. क्यों इतना गुस्सा कर रहे हो?
उसने कहा- कुछ नहीं.
मैंने फिर पूछा- प्लीज बताओ न.
उसने फिर गुस्से में बोला- कुछ नहीं हुआ.. बोला ना.. एक बार समझ में नहीं आता क्या आपको?
मैंने कहा- ठीक है मत बताओ और अब मुझे तुमसे बात भी नहीं करनी और ना मैं अब से खाना खाऊंगी.

इतना कह कर मैं वहां से उठने लगी तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और बस थोड़ी देर यूं ही मुझे देखता रहा.
फिर बोला- आपने मेरा शुक्रिया क्यों किया?
मैंने कहा- तुमने मेरा इतना ख्याल रखा इसलिए.. तो उसमें क्या हुआ?

वो बोला- मैंने आप पर कोई एहसान नहीं किया और ना ही किसी के कहने से किया है. मेरा दिल किया कि मैं वो सब करूँ आपके लिए.. इसलिए किया था और मुझे आपके शुक्रिया की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है. मुझे अच्छा भी नहीं लगता कि कोई मुझे शुक्रिया कहे और आप तो बिल्कुल भी नहीं.
मैंने कहा- ओके मैं आगे से याद रखूंगी.. अब गुस्सा करना बंद करो और खाना खाओ.. मुझे भी बहुत भूख लगी है.

खाना खाने के बाद मैंने जग से कहा- देखो जग, अब हमारे बीच फूफी भतीजे वाला रिश्ता तो रहा नहीं, अब हम दोस्त हो गए हैं. अगर इज़ाज़त हो तो तुमसे कुछ पूछूँ?
उसने कहा- हां पूछिये ना!
मैंने कहा- तुम मुझे इतना घूरते क्यों रहते हो?
उसने कहा- सच बोलूं या झूठ?
तो मैंने कहा- अब तो सच ही बोल दो, तो अच्छा है.
उसने कहा- आप में एक कशिश है, जो मुझे आपकी तरफ ले जाती है. आप खुश तो दिखती हो, मगर आप जितना अपने आपको दिखाती हो, उतना आप अन्दर से होती नहीं हो.

यह सुनते ही मैं उसे बस देखने लगी कि कल का आया हुआ जग.. आज मेरे बारे में इतना अच्छे से कैसे जान गया.
मैंने कहा- मैं बहुत खुश हूँ अपने आप से, अपने पति से, अपनी ज़िन्दगी से, मैं क्यों उदास रहूंगी.
उसने कहा- आपके कहने की ज़रूरत नहीं है. मुझे आंखें और चेहरे दोनों बहुत अच्छे से पढ़ने आते हैं.

अब इसके बाद उसकी बातों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था, तो मैंने दूसरी बात शुरू कर दी- अच्छा … एक बात बताओ, जब तुम यहां से जा रहे थे, तो तुमने वो जो सब बातें कही थीं. क्यों कही थीं? क्या मतलब था उन सब बातों का? और हां तुम रो क्यों रहे थे? मुझे मुड़ कर भी नहीं देखा.

वो थोड़ी देर चुप रहा, जैसे कुछ सोच रहा हो. फिर बोला कि जो सच था वो मैंने बोला कि आप बहुत अच्छी है आपके पति बहुत अच्छे हैं. आपका ख्याल भी रखते हैं मगर आपको उनके साथ सुकून नहीं मिलता और ना वो इतना गहराई में जा कर सोचते हैं. आप बस यादों के सहारे जीती हैं. उस पल को उस समय नहीं जीती हैं, जब जीना चाहिए. उसके गुज़रने के बाद उस पर अफ़सोस करती हैं. आप सोचती हैं … बहुत सोचती हैं, जिससे आपकी आधी ज़िन्दगी अन्दर से बर्बाद है. क्योंकि अपने पति को अच्छा दिखाने और उनके जैसा बनने में आप अपने आपको खो चुकी है. बस अपने पति की तरह दूसरों को खुश करने में ही आपका पूरा दिन निकल जाता है. और आप इसी को अपनी ज़िन्दगी समझ बैठी हैं. अब आप अपने बारे में सोचती ही नहीं हो. ज़रा बाहर निकलिये और सुनिये अपने दिल की.. फिर देखिये कितना सुकून मिलता है.

मैं बस जग को देखे जा रही थी, उसको सुने जा रही थी कि इसको मेरे बारे में कितना कुछ पता है, जब कि आज तक मैंने इसे कुछ बताया भी नहीं.

ऐसे ही दिन गुज़रते गए, हमारी दोस्ती और गहरी होती गई. हम अब हम खुल कर हर चीज़ के बारे में बातें करने लगे थे. यहां तक की मैंने आज चुदाई की या नहीं, वो भी उसको मालूम रहता था. उसने मुझे अब खुल कर सुकून से जीना सिखा दिया था. अब मैंने भी कल के लिए ज्यादा सोचना छोड़ दिया था, आज जो होगा, आज जो है.. बस मैं उसको जीती थी.

ऐसे ही एक दिन मेरे पति ने मुझसे बोला कि वो काम के सिलसिले में 3-4 दिन के लिए बाहर जा रहे हैं.
मैंने पूछा- कब जाओगे?
उन्होंने कहा- कल सुबह ही निकलना है.

अगली सुबह वो चले गए, जाने से पहले उन्होंने कहा- तुम अपना ख्याल रखना कुछ काम हो, तो कॉल कर लेना बाकी तो जग है ही, वो सब संभाल ही लेगा.

फिर मैं जग को उठाने गयी, तो देखा वो पहले से ही उठ चुका था. नाश्ते की टेबल पर जब हम मिले तो जग ने कहा कि अगर बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ?

मैंने कहा- तुम्हारी बातों का मैं कबसे बुरा मानने लगी? और तुम कब से मुझसे इज़ाज़त लेने लगे?
फिर जग बोला- क्या मुझे आपकी ज़िन्दगी का एक दिन मिल सकता है?
मैंने कहा- क्या.. समझी नहीं मैं?
उसने कहा- क्या एक दिन के लिए आप मेरे साथ बाहर घूमने चलेंगी. ना आप कोई आशु हैं.. ना मैं कोई जग.. ना कोई अन्दर वाला, ना कोई बाहर वाला.. बस आप और मैं.
मैंने थोड़ी देर सोचा और पूछा- कब चलना है.
उसने कहा- आज अभी.
मैंने कहा- आज तो नहीं.. सब काम बाकी है.. पूरा घर बिखरा पड़ा है.
उसने कहा- आप बस हां बोलिये और तैयार हो जाइये.. ये सब मैं देख लूंगा.

फिर मैं तैयार होने चली गई.

जब हम निकले तो उस समय घड़ी में 11:30 हो रहे थे. सबसे पहले हम मॉल गए और वहां मूवी देखने लगे, फिर वहां से निकल कर हम लोगों ने थोड़ी शॉपिंग की.. खाना खाया. फिर गार्डन आ गए, वहां हमने खूब मज़े किये. फिर एक होटल में गए, वहां फिर से खाना खाया.
जग ने वहां के मैंनेजर से बात करके मेरी पसंदीदा ग़ज़ल लगवाई.
वहां से फिर हम लोग घर आ गए.

घर आकर हम लोग सोफे पर आराम करने लगे, तो उस वक़्त मैंने जग से कहा- एक बात तो बताओ … तुम मुझे यूं घुमाने क्यों ले गए थे? ये सब तो तुम मुझे ऐसे भी पूछते चलने के लिए तो मैं चलती तुम्हारे साथ.

उसने कहा- अब में और तब में बहुत फर्क है … अब तुम जो गई हो, वो मेरे लिए, मेरी रिक्वेस्ट पर गई हो और तब तुम जहां जातीं, वो बस ऐसे ही घूमने के लिए पहले से ही तैयारी करके जातीं तो वो अचानक वाला मज़ा नहीं आता, जो अब आया है.

फिर मैंने जग से कहा- अगर मैं तुमसे कुछ मांगूं और तुम भी मुझसे वही चीज़ चाहो, तो वो क्या होगी?
वो फट से बोला- मोहब्बत.
मैंने कहा- तुम क्या पागल हो?
उसने कहा- हां तुम्हारे लिए … तुम्हारी ख़ुशी के लिए.

फिर मैं हंस कर सोने चली गयी और जग भी अपने कमरे में चला गया.

रात भर मैं जग के बारे में सोचती रही कि कैसा लड़का है, कुछ मिलने की उम्मीद नहीं है, फिर भी मेरी कितनी फ़िक्र करता है, मेरा कितना ख्याल रखता है और उसका साथ मुझे भी तो कितना अच्छा लगता है. फिर वो बुखार वाली रात मुझे याद आने लगी और आज जो घूम कर आए, उसके बारे में सोचने लगी कि जग कितना पागल है. समय साथ बिताने के लिए, पलों को यादगार बनाने के लिए घूमने चला गया. पूरे रास्ते में मेरा कितना ख्याल रखा.

अब मुझे दूर दूर तक ये ख्याल नहीं था कि मैं जिसके बारे में सोच रही हूँ वो कोई और नहीं मेरे भाई का बेटा है. वो तो अब मेरे लिए मेरा सब से अच्छा दोस्त या उससे भी बढ़ कर हो गया था.
यही सब सोचते सोचते पता ही नहीं चला, कब मेरी आँख लग गई और मुझे नींद आ गई.

दूसरे दिन सुबह जब जग को उठाने गयी तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं. पहली बार मेरी नज़र जग के लंड पर गयी, जो उसके पजामे में तंबू बना हुआ था और वो बेसुध चुपचाप सो रहा था.
मैं उसके करीब गई तो देखा उसका लंड बहुत बड़ा था. शायद मेरे पति से भी ज्यादा बड़ा था. मगर मैं वहां ज्यादा देर रुकी नहीं और नीचे आ गई और जग के उठने का इंतजार करने लगी.

थोड़ी देर में जग फ्रेश होकर नीचे मेरे पास आया और बोला- आज आपने उठाया क्यों नहीं मुझे?
मैंने कहा- मैं बस आ ही रही थी कि तुम खुद ही आ गए. अब तुम बैठो, मैं नाश्ता लेकर आती हूँ.

मैंने नाश्ते करते समय जग से पूछा- तुम्हें सपने आते हैं क्या?
वो बोला- ये कैसा सवाल हुआ? ये तो सब के साथ होता है. सपने तो सबको आते हैं. ये भी कोई पूछने वाली बात है क्या?
मैंने कहा- बस ऐसे ही पूछ लिया. अच्छा तो बताओ आज कोई सपना आया क्या तुम्हें?
उसने कहा- हां आया ना … रोज़ आता है.

मैंने पूछा- वैसे कौन आता है तुम्हारे सपने में?
उसने कहा- आप.
मैंने कहा- मैं क्यों?
उसने कहा- क्योंकि मैं आपसे मोहब्बत करता हूँ ना.
मैंने कहा- अच्छा कैसी मोहब्बत?
वो मुस्कुराया और बोला- छोड़ो ना.. सपने की मोहब्बत है, सपने में ही रहने दो. वैसे आज आप ये सब क्यों पूछ रही हैं?
मैंने कहा- बस ऐसे ही.

उससे बातें करके मैं अपने कमरे में आ गयी और सोचने लगी कि यार लड़का तो मुझ पर मरता है, मुझसे मोहब्बत भी करता है, मेरे लिए सब कुछ करता है, मुझे खुश करने के लिए बहाने ढूंढता है. मुझे भी इसे खुश करना चाहिए, ऐसा कुछ करना चाहिए, जिससे ये एकदम खुश हो जाए. मगर क्या करूं … कैसे करूँ … मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था.

यही सब सोचते हुए मैं नहाने चली गयी. जब नहा रही थी, तो तभी अचानक मुझे एक सुझाव आया कि कैसे मुझे जग को खुश करना है. वो मुझसे मोहब्बत करता है ना.. तो उसको भी बदले में अब मोहब्बत मिलेगी.
मैं उसको प्यार से होंठों पर चूम लूँगी; फिर गले लगा लूँगी; उसको थोड़ा फीलिंग में ले आऊँगी मैं भी थोड़ा फीलिंग में आ जाऊंगी. फिर वो भी खुश … मैं भी खुश.

मैं जब नहा चुकी तो ख्याल आया कि क्यों ना उसे बाथरूम में ही किसी बहाने से बुला लिया जाए और यहां ही सब कर लिया जाए.

फिर मैं उठी और ब्रा पैंटी पहन कर मैंने बाथरूम का दरवाज़ा खोला. देखा कि कोई कमरे में है तो नहीं. जब कोई नहीं दिखा तो चुपके से जा कर मैंने अपना तौलिया बिस्तर पर डाल दिया और फिर वापस बाथरूम में आ गई.
फिर मैंने जग को आवाज़ दी- जग ज़रा इधर आना.
जब मुझे मुझे लगा कोई आ रहा है, तो मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया. जग ने बाथरूम के बाहर आकर मुझे आवाज़ दी- क्या हुआ बोलो?
मैंने कहा- मैं तौलिया लेना भूल गई हूँ.. वो बिस्तर पर मेरा तौलिया रखा है.. जरा दे देना.
उसने कहा- ठीक है, देता हूँ.

फिर जब उसने तौलिया देने के लिए बाथरूम का दरवाज़ा खुलवाया, तो मैंने अपना सिर्फ हाथ बाहर निकाला. जैसे ही उसने मेरे हाथ में तौलिया दिया, मैंने चिल्लाना शुरू कर दिया- ओ मर गई … पकड़ो मुझे … पकड़ो मैं गिर जाऊंगी.

जैसे ही जग ने मेरा हाथ संभालने के लिए पकड़ा, मुझे मैंने गिरने के बहाने से उसे अन्दर खींच लिया. जैसे ही वो अन्दर आया, मैंने गिरने के बहाने से उसे पकड़ लिया और गले से लगा लिया. दो मिनट तक हम दोनों वैसे ही गले लगे रहे. फिर मैं उससे अलग हुई.
वो मुझे इस हालत में ऊपर से नीचे देखे जा रहा था बस. फिर मैंने उसे शुक्रिया कहा और उसे होंठों पर चूमने लगी.

वो पहले तो कुछ देर शायद कुछ समझ नहीं पाया कि उसके साथ क्या हो रहा है. मगर फिर वो भी मेरे होंठों को चूसने लगा. चूसने क्या लगा सच कहूं तो ऐसे काटने लगा जैसे कोई भूखा शेर अपने शिकार पर टूट पड़ता है. उसके हाथ मेरे बदन पर चलने लगे और मेरे चूचों पर आके रुक गए और वो उनको ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा.

थोड़ी देर बाद उसने मुझे गले से लगा लिया और बहुत कस कर पकड़ लिया. कुछ देर ऐसे ही रहा, फिर वो मेरे कंधे पर चूमने लगा, कंधे से चूमता हुआ वो गले पर आ पहुंचा. फिर गले से दूसरी तरफ के कंधे पर.. बस ऐसे ही रेंगते रेंगते चूम रहा था. फिर वो धीरे धीरे नीचे जाने लगा, उसके ऐसा करने से मैं होश में ही ना रही, बस मैं पागल हो रही थी. वो मेरी ब्रा के ऊपर से होता हुआ पेट पर आ गया, फिर पेट से होता हुआ मेरी पैंटी पर आ गया. अब उसने मुझे घुमाकर गांड से फिर ऊपर आने लगा और दोनों हाथ से फिर मेरे चूचे दबाने लगा.

मैं बस सीधी खड़ी लंबी लंबी सांसें ले रही थी. वो कीड़े की तरह रेंगता हुआ ऊपर को आ रहा था. ऊपर आने के बाद उसने मुझे फिर सीधा किया और होंठों को चूसने लगा. फिर यूं ही थोड़ी देर चूसते चूसते रुका और मुझसे बोला- क्या मैं आपकी ब्रा खोल दूँ?

मैंने हां में बस अपना सर हिलाया, तो उसने मेरी ब्रा खोल दी और वहीं नीचे फेंक दी. इसके बाद वो मेरी चूची पर ऐसे टूट पड़ा.. जैसे कि बहुत दिनों का प्यासा हो. वो बारी बारी से दोनों चूचियों को चूस रहा था. उसने मेरे मम्मों को इतना अधिक चूसा कि बस यूं समझिए कि मम्मे लाल ही कर दिए. सच कहूं मुझे बहुत दर्द हो रहा था, जब वो मेरी चूची दबा रहा था मगर उस दर्द से कहीं ज्यादा मज़ा भी आ रहा था.

मुझे ख्याल ही नहीं रहा कि इसके आगे कुछ नहीं करना. वो फिर ऊपर आया और मुझे दीवार पर एकदम से लगा दिया और मेरे होंठों को चूमने लगा. एक हाथ से मेरी चुची दबाने लगा और दूसरे हाथ से मेरी पैंटी के ऊपर से मेरी चूत सहलाने लगा. उसकी इस हरकत से मैं फड़फड़ाने लगी. मैंने कहा- प्लीज ऐसा मत करो.. मैं मर जाऊंगी.
मगर अब वो कहां कुछ सुनने वाला था. उसने चूत सहलाना और तेज़ कर दिया. मैंने उसे रोका भी कि ऐसा मत करो.. रूको.

मगर वो नहीं माना और मुझसे पूछे बिना ही मेरी पैंटी निकाल दी. फिर वो मेरी गीली हो चुकी चूत में उंगली करने लगा. मुझे मज़ा तो बहुत आ रहा था, लेकिन उसको रोकना भी ज़रूरी था. मगर जग था कि रुकने का नाम नहीं ले रहा था.

फिर अचानक वो रुका, उसने मेरी तरफ बड़े प्यार से देखा. अब तक हम दोनों पसीने में नहा चुके थे. फिर उसने मुझे गोद में उठाया और कमरे में बिस्तर पर ले आया. बिस्तर पर मुझे गिराने के बाद उसने अपने सारे कपड़े निकाल दिए, बस अंडरवियर नहीं निकाली, जिसमें उसका तंबू बना हुआ लंड साफ़ साफ़ दिख रहा था.

अब उसने फिर से मुझ पर चढ़ाई कर दी और मेरे होंठों को चूसने लगा, फिर होंठों से होता हुआ गले पर आया और मुझे खूब चाटा और काटा. फिर वो मेरी चूचियों पर आ गया, फिर एक बार वो किसी बच्चे की तरह उनसे खेलने लगा. कभी एक चूची चूसता और दूसरे की निप्पल को उंगलियों से घुमाता, कभी एक निप्पल को दांत से काटता और दूसरे को हाथों से बहुत जोर से दबाता.

मैं बस लम्बी लम्बी सांसें ले रही थी और धीमी धीमी आवाजें निकाल रही थी. फिर उसके बाद वो और नीचे जाने लगा और पेट पर अपनी जीभ घुमाने लगा और पेट को चाटने लगा. वो मुझे बस पागल किये जा रहा था, मैं बिन पानी की मछली की तरह तड़प रही थी. वो ऐसे ही रेंगते हुए मेरी चूत के पास आ गया और उसके आस पास चूमने लगा. फिर वहीं से चूमते चाटते ऊपर आने लगा और मुझे इधर उधर चूमने लगा.

फिर उसने मुझसे पूछा- आप मेरा लंड चूसोगी?
तो मैंने मना कर दिया.
फिर उसने कहा- चूत के अन्दर ऐसे ही डाल दूँ?

मैंने अपने सर हां में हिला कर उसे हरी झंडी दिखा दी. फिर उसने अपनी अंडरवियर निकाली और अपना बड़ा सा लंड मेरी चूत पर सैट किया और सीधा मेरे ऊपर आ गया. उसने लंड सैट करके मेरी तरफ देखा और एक धक्का दे दिया जिससे उसका लंड आसानी से मेरी चूत में चला गया. चूंकि मेरे पति मुझे रोज़ चोदते हैं.. इसलिए मुझे लंड लेने की आदत है, मगर उसका थोड़ा सा बड़ा था तो अन्दर जड़ में जाकर थोड़ा दर्द हो रहा था. नीचे से वो मेरी चुदाई कर रहा था और ऊपर मेरे होंठों को काट रहा था. मेरी चूची को दबा रहा था, चूस रहा था.

करीब 10-15 मिनट की चुदाई के बाद उसका पानी निकल गया और मेरा भी काम हो गया. वो थोड़ी देर मुझ पर यूं ही निढाल हो कर पड़ा रहा. फिर मैंने उसको हटने के लिए कहा, तो वो एक तरफ हो गया. मैं उठ कर बाथरूम में चली गयी, फिर वापस आयी तो देखा कि जग भी कमरे से चला गया था.

कुछ देर बाद मैं किचन में चली गयी खाना बनाने के लिए बाद में खाने पर मैंने जग को बुलाया. वो आया मगर वो मुझसे नज़र नहीं मिला रहा था, ना मुझसे बात कर रहा था.
मैंने उससे पूछा- क्या हुआ जग तुम मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हो?
उसने कहा- मुझे माफ़ कर दीजिए सुबह के लिए.
मैंने कहा- तुम माफ़ी क्यों मांग रहे हो? जो भी हुआ हम दोनों की मर्ज़ी से हुआ है और मैं तो इससे खुश हूँ. सच बताऊं तो मुझे पहली बार चुदाई कर के इतनी ख़ुशी हुई है. तुमने मुझे आज जैसा एहसास दिलाया है, मैंने कभी नहीं किया. ऐसा नहीं है कि मेरे पति कमज़ोर हैं मगर वो इतना खेलते नहीं हैं. चुदाई से पहले बस 2-4 चुम्मियां की, कपड़े उतारे और अपना काम कर लेते थे. मुझे पता है.. तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा मगर फिर भी तुम्हें आज के लिए दिल से शुक्रिया. तुम मुझे समझाते हो कि ज्यादा सोचना नहीं चाहिए. जो होता है अच्छे के लिए होता है. जो चलता है उसको चलने दो. जिस बात से ख़ुशी मिले, जिस काम से ख़ुशी मिले, वो करो. तुम मुझे जीना सीखा कर खुद भूल रहे हो जग.

जग ये सब सुन कर खुश हुआ और बोला- तुम तो काफी समझदार हो गयी हो.
फिर मैंने कहा- अब मैं तुम्हें नहीं छोडूंगी, बस अपने पास ही रखूंगी, तुम बस मेरे साथ रहना मुझे और कुछ नहीं चाहिए तुमसे.
उसने कहा- तुम्हारे पास तुम्हारा पति है.
मैंने कहा- तुम उसकी फ़िक्र मत करो, मैं उनका हक नहीं मारूंगी और ना तुम्हें दिन रात चिपकने के लिए बोल रही हूँ. बस जब ऐसा लगेगा कि मुझे जग चाहिए, तो उस वक़्त तुम्हारे बारे सोचूंगी, बाकी मैं अपने पति की हूँ.

दो दिन बाद मेरे पति आ गए और दो महीनों के बाद जग चला गया. उन दो महीनों में मैंने अपनी ज़िन्दगी के सारे अरमान पूरे कर लिए. जग खुद तो ज़रूर ज़िन्दगी से उलझा हुआ था, मगर मुझे ज़िन्दगी जीना सिखा गया, खुश रहना सिखा गया. जब भी कभी मुझे जग की याद आती है तो मैं उन दो महीनों को याद कर लेती हूँ. जग मुझे मिलता तो आज भी है. मगर उन दो महीनों की बात ही कुछ और थी. उन दो महीनों में जो भी किया, जितना भी जिया.. बस मुझे और मेरे दिल को पता है.

तो दोस्तो, कैसी लगी मेरी हिंदी सेक्स कहानी, ज़रूर बताइएगा.
धन्यवाद.
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